शवदाह की तैयारी कर ख़ुदकुशी करने वाले किसान की कहानी
"वो घर से निकला था- पास के शहर से घर का कुछ सामान ख़रीदने. लेकिन लौटकर घर नहीं आया. घर आया, तो कुछ सामान - कुछ चूड़ियां, सफेद कपड़े का एक टुकड़ा, हल्दी, सिन्दूर और फूलों का एक हार. घर के लिए उसने यही सामान ख़रीदा था, लेकिन घर को इनमें से किसी सामान की ज़रूरत नहीं थी. दरअसल उसने ये सामान अपनी ही अर्थी को सजाने के लिए खरीदा था."
ये सब बोलते-बोलते माधवय्या की आवाज़ भर्रा गई.
माधवय्या के पिता मल्लप्पा आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में कम्बदुरुमंडल में पड़ने वाले रामपुरम गांव के किसान थे. अपनी अंतिम यात्रा के लिए ज़रूरी सारे सामान ख़रीदने के बाद उन्होंने ख़ुदकशी कर ली.
मरने के बाद परिवार के लोग उन्हें याद रखें, इसके लिए उन्होंने अपनी एक लैमिनेटेड तस्वीर भी तैयार कर दी थी.
उनके परिजनों ने बताया कि कर्ज़ में डूबे मल्लप्पा ने अगस्त 2018 में अपनी जान दे दी. फसल ख़राब हो गई थी और वो कर्ज़ चुकता करने में असमर्थ थे.
अंतिम संस्कार का भार वो अपने परिवार पर नहीं डालना चाहते थे. यही कारण रहा होगा कि हमेशा के लिए आंखें बंद करने से पहले उन्होंने अपने शवदाह की व्यवस्था भी ख़ुद ही कर ली.
पास के शहर से मल्लप्पा ने शवदाह के लिए ज़रूरत के सारे सामान खरीदे. शव को ढंकने के लिए सफेद कपड़ा, पत्नी के लिए चूड़ियां और अंतिम संस्कार के लिए फूलों का हार.
फिर वो गांव की सड़क के किनारे अपने खेत पर पहुंचे. एक पर्ची के साथ सारा सामान अपने पिता की समाधि पर रखा. पर्ची में विभिन्न कर्ज़दाताओं के नाम और उनसे कर्ज़ ली गई रकम का ब्योरा था. उन्होंने सभी कर्ज़दाताओं का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें कर्ज़ दिया था.
मल्लप्पा स्वयं लिखने-पढ़ने में असमर्थ थे. लिहाजा पर्ची तैयार करने के लिए उन्होंने एक गांव वाले से मदद ली और पर्ची को अन्य सामानों के साथ एक बैग में रख दिया.
कीटनाशक पीकर की ख़ुदकुशी
इसके बाद वो आहुत पहुंचे. उनके खेतों के ठीक सामने एक जगह थी, जहां वो खेत में काम करने के बाद आराम किया करते थे. यहीं उन्होंने कीटनाशक पीकर ख़ुदकुशी कर ली.
अगली सुबह मल्लप्पा के बेटे माधवय्या मवेशियों को चराने के लिए खेत में गए तो उनकी नज़र अपने दादा की समाधि पर रखे सामानों पर पड़ी.
समाधि पर फूलों का हार, सफेद कपड़ा और उसके पिताजी की लैमिनेटेड तस्वीर देखकर उसका माथा ठनका. आसपास देखने पर उसे दूर चारपाई पर एक व्यक्ति लेटा हुआ नज़र आया.
आंसूओं से भरी आंखों से माधवय्या ने बीबीसी को बताया, "मुझे कुछ गलत होने का आभास हुआ और मैं झोपड़ी में गया. मैं सदमे में आ गया. वो मेरे पिताजी थे."
ये सब बोलते-बोलते माधवय्या की आवाज़ भर्रा गई.
माधवय्या के पिता मल्लप्पा आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में कम्बदुरुमंडल में पड़ने वाले रामपुरम गांव के किसान थे. अपनी अंतिम यात्रा के लिए ज़रूरी सारे सामान ख़रीदने के बाद उन्होंने ख़ुदकशी कर ली.
मरने के बाद परिवार के लोग उन्हें याद रखें, इसके लिए उन्होंने अपनी एक लैमिनेटेड तस्वीर भी तैयार कर दी थी.
उनके परिजनों ने बताया कि कर्ज़ में डूबे मल्लप्पा ने अगस्त 2018 में अपनी जान दे दी. फसल ख़राब हो गई थी और वो कर्ज़ चुकता करने में असमर्थ थे.
अंतिम संस्कार का भार वो अपने परिवार पर नहीं डालना चाहते थे. यही कारण रहा होगा कि हमेशा के लिए आंखें बंद करने से पहले उन्होंने अपने शवदाह की व्यवस्था भी ख़ुद ही कर ली.
पास के शहर से मल्लप्पा ने शवदाह के लिए ज़रूरत के सारे सामान खरीदे. शव को ढंकने के लिए सफेद कपड़ा, पत्नी के लिए चूड़ियां और अंतिम संस्कार के लिए फूलों का हार.
फिर वो गांव की सड़क के किनारे अपने खेत पर पहुंचे. एक पर्ची के साथ सारा सामान अपने पिता की समाधि पर रखा. पर्ची में विभिन्न कर्ज़दाताओं के नाम और उनसे कर्ज़ ली गई रकम का ब्योरा था. उन्होंने सभी कर्ज़दाताओं का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें कर्ज़ दिया था.
मल्लप्पा स्वयं लिखने-पढ़ने में असमर्थ थे. लिहाजा पर्ची तैयार करने के लिए उन्होंने एक गांव वाले से मदद ली और पर्ची को अन्य सामानों के साथ एक बैग में रख दिया.
कीटनाशक पीकर की ख़ुदकुशी
इसके बाद वो आहुत पहुंचे. उनके खेतों के ठीक सामने एक जगह थी, जहां वो खेत में काम करने के बाद आराम किया करते थे. यहीं उन्होंने कीटनाशक पीकर ख़ुदकुशी कर ली.
अगली सुबह मल्लप्पा के बेटे माधवय्या मवेशियों को चराने के लिए खेत में गए तो उनकी नज़र अपने दादा की समाधि पर रखे सामानों पर पड़ी.
समाधि पर फूलों का हार, सफेद कपड़ा और उसके पिताजी की लैमिनेटेड तस्वीर देखकर उसका माथा ठनका. आसपास देखने पर उसे दूर चारपाई पर एक व्यक्ति लेटा हुआ नज़र आया.
आंसूओं से भरी आंखों से माधवय्या ने बीबीसी को बताया, "मुझे कुछ गलत होने का आभास हुआ और मैं झोपड़ी में गया. मैं सदमे में आ गया. वो मेरे पिताजी थे."
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