क्या स्मार्ट सिटी मिशन के तहत भारत के 100 शहर वाक़ई स्मार्ट बन गए हैं?: बीबीसी रियलिटी चेक
सच्चाई: इस प्रोजेक्ट की डेडलाइन आगे खिसक गई है क्योंकि किन शहरों को स्मार्ट बनाया जाएगा, इसका फ़ैसला एक ही वक़्त पर नहीं हुआ. इतना ही नहीं, अब तक स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए आवंटित फ़ंड का एक छोटा सा हिस्सा ही इस्तेमाल हो पाया है.
भारतीय लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं और इसलिए बीबीसी रियलिटी चेक टीम प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के किए दावों और वादों की पड़ताल कर रही है.
सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए निवेश का ऐलान साल 2014 में लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान किया था. इसके बाद 'स्मार्ट सिटी योजना' अगले साल यानी 2015 में लॉन्च हुई.
विपक्षी पार्टियों ने सरकार की 'स्मार्ट सिटी योजना' को प्रचार का एक ज़रिया भर बताया है और कहा है कि इसके नतीज़े ज़मीन पर नहीं दिखाई दे रहे हैं.
भारत की शहरी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और अगले एक दशक में इसके 60 करोड़ तक पहुंच सकती है.
भारतीय शहरों की स्थिति ख़राब इंफ़्रास्ट्रक्चर और घटिया सार्वजनिक सेवाओं की वजह से बद से बदतर होती जा रही है.
भारत सरकार ने ये साफ़ किया है कि स्मार्ट सिटी की कोई तय परिभाषा नहीं है. लेकिन इसने 100 चुने गए शहरों में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए फ़ंड देने का वादा किया. सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों के इस्तेमाल की बात कही थी.
सरकार का दावा था कि इन 100 शहरों में न सिर्फ़ बिजली और ऊर्जा की कमी पूरी करने वाली इमारतें होंगी बल्कि सीवेज के पानी कूड़े और ट्रैफ़िक जैसी तमाम बुनियादी समस्याओं से निबटने के लिए नई टेक्नॉलजी का इस्तेमाल भी होगा.
मोदी सरकार ने स्मार्ट सिटीज़ मिशन के लिए देश भर से 100 शहरों को चुना और शहरों की आख़िरी सूची 2018 में चुनी गई.
हालांकि इस प्रोजेक्ट की शुरुआत ही इतनी देर से हुई कि इसकी पहली डेडलाइन पीछे छूट गई और अब इसे पूरा करने का वक़्त बढ़ाकर 2023 कर दिया गया है.
इस योजना के तहत हर स्मार्ट सिटी को केंद्र की ओर से कुछ सालाना बजट दिए जाने की बात कही गई थी. इसके अलावा राज्यों और स्थानीय निकायों की ओर से भी कुछ राशि दिलाने की योजना थी.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि स्मार्ट सिटी मिशन शहरों की मौजूदा क्षमता बढ़ाने के बजाय नई योजनाओं पर ज़्यादा ध्यान देता है.
जानकार कहते हैं कि शहरों में साइकिल शेयर करने की सुविधा और पार्क बनाना तब तक नाकाफ़ी होगा जब तक इन चीज़ों को पूरे शहर की प्लानिंग में ठीक तरीके से शामिल न किया जाए.
संसदीय समिति की एक रिपोर्ट ने कहा है कि जो एजेंसियां इन योजनाओं को लागू करने के लिए ज़िम्मेदार हैं उनके साथ बेहतर तालमेल न होने की वजह से स्मार्ट सिटी मिशन का असर लोगों को नज़र नहीं आ रहा है.
सरकार का कहना है कि इसने स्थानीय निकायों को उनकी मौजूदा क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण का प्रस्ताव दिया था. लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि सरकार के ये प्रस्ताव कितने सफल रहे.
सरकार ने संसद में बताया कि अक्टूबर, 2017 के मुकाबले स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पूरी होने वाली योजनाओं में 479% की बढ़त हुई है.
आवास और शहरी मामलों के राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बीबीसी को बताया कि प्रोजेक्ट के तहत 13 संयुक्त केंद्र पहले से ही चालू हैं.
पुरी ने कहा, "अगर हमने दिसंबर 2019 तक 100 में से 50 प्रोजेक्ट भी पूरे कर लिए हैं तो मेरे हिसाब से ये दुनिया में कहीं भी सबसे तेज़ी से लागू की गई योजनाओं में से एक है."
भारतीय लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं और इसलिए बीबीसी रियलिटी चेक टीम प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के किए दावों और वादों की पड़ताल कर रही है.
सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए निवेश का ऐलान साल 2014 में लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान किया था. इसके बाद 'स्मार्ट सिटी योजना' अगले साल यानी 2015 में लॉन्च हुई.
विपक्षी पार्टियों ने सरकार की 'स्मार्ट सिटी योजना' को प्रचार का एक ज़रिया भर बताया है और कहा है कि इसके नतीज़े ज़मीन पर नहीं दिखाई दे रहे हैं.
भारत की शहरी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और अगले एक दशक में इसके 60 करोड़ तक पहुंच सकती है.
भारतीय शहरों की स्थिति ख़राब इंफ़्रास्ट्रक्चर और घटिया सार्वजनिक सेवाओं की वजह से बद से बदतर होती जा रही है.
भारत सरकार ने ये साफ़ किया है कि स्मार्ट सिटी की कोई तय परिभाषा नहीं है. लेकिन इसने 100 चुने गए शहरों में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए फ़ंड देने का वादा किया. सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों के इस्तेमाल की बात कही थी.
सरकार का दावा था कि इन 100 शहरों में न सिर्फ़ बिजली और ऊर्जा की कमी पूरी करने वाली इमारतें होंगी बल्कि सीवेज के पानी कूड़े और ट्रैफ़िक जैसी तमाम बुनियादी समस्याओं से निबटने के लिए नई टेक्नॉलजी का इस्तेमाल भी होगा.
मोदी सरकार ने स्मार्ट सिटीज़ मिशन के लिए देश भर से 100 शहरों को चुना और शहरों की आख़िरी सूची 2018 में चुनी गई.
हालांकि इस प्रोजेक्ट की शुरुआत ही इतनी देर से हुई कि इसकी पहली डेडलाइन पीछे छूट गई और अब इसे पूरा करने का वक़्त बढ़ाकर 2023 कर दिया गया है.
इस योजना के तहत हर स्मार्ट सिटी को केंद्र की ओर से कुछ सालाना बजट दिए जाने की बात कही गई थी. इसके अलावा राज्यों और स्थानीय निकायों की ओर से भी कुछ राशि दिलाने की योजना थी.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि स्मार्ट सिटी मिशन शहरों की मौजूदा क्षमता बढ़ाने के बजाय नई योजनाओं पर ज़्यादा ध्यान देता है.
जानकार कहते हैं कि शहरों में साइकिल शेयर करने की सुविधा और पार्क बनाना तब तक नाकाफ़ी होगा जब तक इन चीज़ों को पूरे शहर की प्लानिंग में ठीक तरीके से शामिल न किया जाए.
संसदीय समिति की एक रिपोर्ट ने कहा है कि जो एजेंसियां इन योजनाओं को लागू करने के लिए ज़िम्मेदार हैं उनके साथ बेहतर तालमेल न होने की वजह से स्मार्ट सिटी मिशन का असर लोगों को नज़र नहीं आ रहा है.
सरकार का कहना है कि इसने स्थानीय निकायों को उनकी मौजूदा क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण का प्रस्ताव दिया था. लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि सरकार के ये प्रस्ताव कितने सफल रहे.
सरकार ने संसद में बताया कि अक्टूबर, 2017 के मुकाबले स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पूरी होने वाली योजनाओं में 479% की बढ़त हुई है.
आवास और शहरी मामलों के राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बीबीसी को बताया कि प्रोजेक्ट के तहत 13 संयुक्त केंद्र पहले से ही चालू हैं.
पुरी ने कहा, "अगर हमने दिसंबर 2019 तक 100 में से 50 प्रोजेक्ट भी पूरे कर लिए हैं तो मेरे हिसाब से ये दुनिया में कहीं भी सबसे तेज़ी से लागू की गई योजनाओं में से एक है."
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